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Monday, 18 January 2016

दशहरा का पर्व एवं उसकी समसामयिकता


         दशहरा या दसेरा शब्द 'दश' (दस) एवं 'अहन्‌‌' से बना है विजयदशमीया आयुध पूजा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है ।

  इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर 'विजयादशमी'  कहते हैं। इस दिन रामचंद्रजी चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है।  आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति
    
    इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजाकी जाती है। प्राचीन काल में राजा, इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है।  रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह  शक्ति-पूजा का पर्व एवं शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है।
भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया,  पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है ।
धार्मिक मान्यता      

हिन्दू धर्म के अनुसार इस दिन राम ने रावण का वध किया था। रावण राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लंका ले गया था। भगवान राम युद्ध की देवी मां दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन लंका नरेश रावण का वध किया।
ब्रज के मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से क्षत्रियों का माना जाता है। इसमें अपराजिता देवी की पूजा होती है। यह पूजन भी सर्वसुख देने वाला है।

दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहाँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न  ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। इसी कारण विजयकाल में शमी वृक्ष का पूजन होता है।

सांस्कृतिक पहलू
     
     दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का ठिकाना नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारत-वर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। 

महाराष्ट्र में इसे सामाजिक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार करशमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।

बंगाल में इसे नारी शक्ति की उपासना और माता दुर्गा की पूजा अर्चना के लिए श्रेष्ठ समयों में से एक माना जाता है। अपनी सांस्‍कृतिक विरासत के लिए मशहूर बंगाल में दशहरा का मतलब है दुर्गा पूजा। बंगाली पांच दिनों तक माता की पूजा-अर्चना करते हैं जिसमें चार दिनों का अलग महत्व होता है। ये चार दिन पूजा के सातवें, आठवें, नौवें और दसवें दिन होते हैं, जिन्हें क्रमश: सप्तमी, अष्टमी, नौवीं और दसमी के नामों से जाना जाता है। दसवें दिन प्रतिमाओं की भव्य झांकियां निकाली जाती हैं और उनका विसर्जन पवित्र गंगा में किया जाता है। गली-गली में मां दुर्गा की बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं को राक्षस महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है।
 
दशहरे की समसालयिकता

       
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक - आज हर तरफ फैले भ्रष्टाचार और अन्याय रूपी अंधकार को देखकर मन में हमेशा उस उजाले की चाह रहती है जो इस अंधकार को मिटाए। कहीं से भी कोई आस ना मिलने के बाद  हमें हमारी संस्कृति के ही कुछ पन्नों से आगे बढ़ने की उम्मीद मिलती है। हम सबने रामायण को किसी ना किसी रुप में सुना, देखा और पढ़ा ही होगा। रामायण हमें यह सीख देती है कि चाहे असत्य और बुरी ताकतें कितनी भी ज्यादा हो जाएं पर अच्छाई के सामने उनका वजूद एक ना एक दिन मिट ही जाता है। अंधकार के इस मार से मानव ही नहीं भगवान भी पीड़ित हो चुके हैं लेकिन सच और अच्छाई ने हमेशा सही व्यक्ति का साथ दिया है ।

राम और रावण की कथा तो हम सब जानते ही हैं जिसमें राम को भगवान विष्णु का एक अवतार बताया गया है। वह चाहते तो अपनी शक्तियों से सीता को छुड़ा सकते थे लेकिन मानव जाति को यह पाठ पढ़ाने के लिए कि “हमेशा बुराई अच्छाई से नीचे रहती है और चाहे अंधेरा कितना भी घना क्यूं ना हो एक दिन मिट ही जाता है”, उन्होंने मानव योनि में जन्म लिया और एक आदर्श प्रस्तुत किया।  रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों के रूप में लोग बुरी ताकतों को जलाने का प्रण लेते हैं। आज दशहरे का मेला जगह की कमी की वजह से छोटा होता जा रहा है लेकिन दशहरा आज भी लोगों के दिलों में भक्तिभाव को ज्वलंत कर रहा है।

Tuesday, 17 November 2015

कहानी के किरदार- किरदारों की कहानी


हर कहानी में किरदार का अपना १ अलग ही महत्व होता है, बिना किरदारों के कहानी कहना या गढना असंभव सी बात है | ये ठीक उस तरह की बात है कि जैसे शादी है पर बगैर दूल्हा दुल्हन के, बहुत से लेखकों का मानना है कि कहानी की शुरुआत ही किरदार से आरंभ होती है | जब कोई किरदार आप आस पास के माहौल में देखते हैं तो आपके दिमाग़ में १ कहानी पनपनी शुरू हो जाती है |

कहानी अपना आकार किरदार के साथ ही ले पाती है, और किरदार भी अपना रंग तब जमा सकता है जब कहानी किरदार की पकड़ में हो. ये भी सच है की किरदार कोई पैदा करने वाला जीव नहीं है, वो पहले से ही हमारे आसपास के जीवन में जीवन यापन कर रहे होते हैं | आप मंटो साहब की कोई भी कहानी पढ़ लीजिए आपको उनकी कहानी के किरदार ऐसे मालूम पड़ेंगे जैसे वे किरदार आपसे मेल खाते हों. और हुआ भी यही था, जब भी उन्होने किसी कहानी का खाका अपने ज़हन में डाला तो उनके किरदार सबसे पहले उनके लिखे हुए पन्नों पर दस्तक देते थे. उसके बाद कहानी अपने चरम पर होते हुए पाठकों के दिमाग़ और दिल पर गहरा प्रभाव छोड़ती थी और आज भी लोग मंटो के प्रभाव से निकल नहीं पाए हैं |

कॉलेज में एक उपन्यास पढ़ा था  "जहाज़ का पंछी" इलाचंद्र जोशी जी का लिखा हुआ एक अजीब सी दुनिया में ले जाने वाला उपन्यास, इस उपन्यास का नायक एक घूमकड़ इंसान होता है जो हर बार अपनी यात्रा खुद तय करता है, वो न जाने किस चीज़ की तलाश में भटक रहा होता है, किस मंज़िल को पाने हेतु वो दर दर की ठोकरें ख़ाता है | यह एक आत्मकथा की शैली में लिखा हुआ उपन्यास है | इस किरदार को लेखक ने शायद अपने अंदर जिया है तभी वो इतने अच्छे से संप्रेषण हो पाता है कथा में.


यहाँ मैं एक और उपन्यास का ज़िक्र करना चाहूँगा जिसका शीर्षक "काशी का अस्सी है" इस उपन्यास के लेखक "काशीनाथ" हैं जो काशी यानी बनारस में ही निवास करते हैं | काशी का अस्सी लिखने से पहले काशीनाथ जी ने बनारस को अच्छे से घोट के पिया हुआ था, मेरा यहाँ ये मतलब है कि वे काशी  के चप्पे चप्पे से वाकिफ़ हैं |
काशीनाथ जी ने इस उपन्यास को वास्तविकता का ऐसा लबादा ओढ़ाया है जो वाकई में बहुत बहुत क़ाबिले तारीफ है!

उन्होने काशी नगरी  के अस्सीघाट के उन लोगों का महीन निरीक्षण किया जो मनोरंजक होने के साथ साथ किरदार के प्रारूप में एकदम फिट बैठते थे. काशीनाथ जी इन किरदारों से रोज पप्पू की मशहूर चाय की दुकान  में मिलते और उनकी कही बातें उनके गप्पे सब अपने जहन में डाल लेते और घर आकर उन्हें पन्नों पे उतार देते.

तो इसी तरीके को आजमाते हुए काशीनाथ जी ने काशी का अस्सी का निर्माण किया. उन्होने सिर्फ़ किरदारों की खोज़ की और बस फिर बन गया अपने आप में हिन्दी साहित्य का एक कामयाब उपन्यास. विश्व साहित्य की या और दूसरी भाषाओं की कहानियों की बात की जाए तो वहाँ भी यही प्रारूप कामयाब रहा है. लियो तोल्स्तोय से लेकर व्लादिमीर नावकोव तक ने सिर्फ़ मज़बूत और वास्तविक किरदारों का उपयोग करके बेहतरीन रचनाओं का सृजन किया.

कहतें हैं लियो तोल्स्तोय ने जब वार एंड पीस लिखा तो उन्होनें उस समय रूसी राजतंत्र   का बहुत ही बारीकी से विश्लेषण किया, इसीलिए वार एंड पीस में इतने सारे किरदार हैं और वे सभी कहानी को उसकी मंज़िल तक ले जाते हैं. चलिए यहाँ तो हमने कुछ लेखकों की कहानियों के बारे में बात की लेकिन अगर हम कहानी और किरदार की असली बात करें तो वो ये है की इन दोनो का एक दूसरे के बिना निर्वाह नहीं हो सकता. अगर कहानी को सृजन की कड़ाही में तलना है तो सबसे पहले हमें किरदारों को मसालों की माफ़िक़ इस्तेमाल करना होगा. हम अगर किरदारों में भी अगर इतना घुस गये की कहानी को ही भूल जाएँ तो वो भी कहानी और किरदारों के लिए अच्छी बात नहीं होगी. इसलिए कहानी और किरदार दोनों को हम किसी कहानी के दो मुख्य और आरम्भिक तत्व मान सकते हैं. तो अबकी बार जब हम कोई कहानी सोचेंगे या लिखेंगे तो हम सबसे पहले किरदार ढूंढ़ेंगे और फिर कहानी की ज़मीन पर क़िस्सों का १ मकान बनाएँगे.

- Ashish Jangra
StoryMirror

Monday, 12 October 2015

Young साहित्य – StoryMirror Square (SMS) रोमांच रचनाकारों का

     

होज़ख़ास विलेज़  में सोलह अगस्त के दिन कुंजूम café में इतनी ज़्यादा भीड़ मोजूद थी कि वहाँ हर कोई हैरान हुए बिना नहीं रह सका | इतना शौर था की कुंजूम  café  गिलास में रक्खी आइस क्यूब की माफिक़ खड़खड़ा रहा था | थोड़ी देर में लोगों को मामला समझ आ चुका था | वहाँ StoryMirror Square (SMS)  नाम से एक राइटर मीट अप चल रहा था | जिसमें लोग बड़े चाव के साथ शरीक़ हुए थे | वहाँ डीयू  के बहुत सारे ऐसे लड़के - लड़कियाँ भी थे जो लिखने और सुनाने के लिए बहुत ज़्यादा excited थे| मीट अप अपने तयशुदा वक़्त पर शुरू हुआ यानी दोपहर के बारह बजते ही शंखनाद हो चुका था | सबसे पहले StoryMirror की टीम ने सबका इस्तक़बाल किया और उसके बाद टीम के हर एक सदस्य ने अपना स्वतंत्र रूप से संक्षिप्त सा इंट्रो दिया | उसके बाद सभी उत्सुक राइटर्स  से उनके बारे में भी पूछा गया , उनकी दिलचस्पीयों के बारे में  भी जानकारी ली गई |

       हिन्दी और ठेठ भाषाओं के साथ स्टायर का इस्तेमाल बहुत आसानी के साथ करता है | मीट अप में देखने के लिए जो सबसे खास बात लगी वो ये थी की हर आयु वर्ग के राइटर्स वहाँ मोजूद थे | साथ ही "गिरीश शर्मा " जैसा उम्दा और आश्र्यचकित करने वाला गिटारिस्ट ,सिंगर और musician भी अपनी प्रस्तुति के लिए मीटअप में मोजूद था | सीनियर लोगो में किरण बाबल जी ,मुकेश निरूला जी भी अपनी कविताओं के साथ जो हम सबके लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं मोजूद थे | ईशान दफ़ूटी , तौसीफ़ अहमद , रेहान ख़ान, इंदरजीत घोषाल, नज़रे इमाम, सच्ची कक्कर , राखी शर्मा, प्राशू जैन, भारत शर्मा, सोम्या तिवारी, मीमांसा शेखर, अंकिता गोयल, रजत महयच, हरेन्दर शर्मा जैसे दिल्ली  शहर के युवा लेखक भी इस जलसे में एक नये उत्साह के साथ शरीक हुए | डीयू  से जो विद्यार्थी राइटर्स आए थे , उन्होने तो अंदर तक झकझोर दिया अपनी लिखी हुई रचनाओं को सुनाकर | किसी ने Poem सुनाई किसी ने शॉर्ट स्टोरी तो किसी ने लेख भी सुना दिया | तभी तो हम कह सकते हैं की इस मीट अप में किसी भी तरह की कोई सीमाएँ नहीं थी | मीट अप के मध्य में गिरीश और भारत ने ऐसा माहौल बनाया की कुछ मिनटों तक सिर्फ़ तालियाँ ही सुनाई देती रही |
StoryMirrorइस मीट अप का संचालन आशीष  और आसिफ़  ने किया | जहाँ आसिफ़ विशुद्ध अँग्रेज़ी मे लिखता है तो वहीं आशीष

       वास्तव में young साहित्य ने पूरी तरह से literature का नक्शा बदल के रख दिया है | इतनी कम उम्र के बावजूद आप एक अनुभवी रचना को सबके सामने पेश करते हो ये अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती है | sms मीट अप के दौरान सभी राइटर्स को कुंजूम café  की फ्री coffee  स्कीम का भी बहुत बड़ा फायडा मिला | पूरे मीट अप के दौरान हर किसी के दिल में ये बात ज़रूर आई होगी की साहित्य सच में ही अब उम्र की बंदिशो में नहीं रहा | ऐसे युवा जन्म ले चुके हैं जो गहरे साहित्य के साथ उसमें रचने बसने का माद्दा रखते हैं | और इसी मुहिम को आगे ले जाने के लिए स्टोरी मिरर  sms को अस्तित्व में लाया है | आप ये मानिए की StoryMirror ने एक नई क्रांति का आगाज़ किया है जिससे young साहित्य को सच में ही एक बहुत बड़ा मंच मिला है | जिसपर young साहित्य अपना नाट्य खुद लिखेगा और खुद ही प्रस्तुत करेगा | StoryMirror  ने हरेक पहलू  पर सबसे खुलकर बात की गई , लोगों के विचार भी सुने गये StoryMirror को लेकर | इसके बाद सबने खुशी खुशी वहाँ से विदा ली StoryMirror के गुडिज़ के साथ , साथ ही ग्रूप फोटो भी खिचवाई गई | एक अनूठे और नये उत्साह के साथ वहाँ  से सबने विदा ली | sms का ये पहला राइटर्स मीट अप समाप्त हो चुका था लेकिन कुंजूम  cafe में काम करने वाले जगदीश और बाकी लोग अब भी अचम्भित थे पहली बार ऐसा young साहित्य का महाकुंभ देखकर |

- Ashish Jangra
  StoryMirror

Wednesday, 7 October 2015

YOUNG साहित्य – Writer Groups & Poet Meet ups



हिन्दुस्तान की युवा साहित्य पीढ़ी अब कवि सम्मेलन  नहीं जाती और ना ही कवि गोष्ठियों में , क्योंकि उसने खुद एक ऐसा चलन  चला दिया है जो उसकी सुविधनुसार है |  इस  YOUNG जनरेशन ने  Poet Meets , Writer groups और  Writing Workshop  नाम की कुछ ऐसी चीज़ों का आविष्कार कर दिया, जिसकी बदोलत इन्होने खुद के Literature  का उत्पादन किया है | कुछ  Poetry groups ,  Pach , Poets collective  , Poets corner , Delhi Poetry  , Poets Artist unplugged  इस युवा पीढ़ी का जी भरके साथ दे रहे हैं  | इन लोगों को वो मंच हासिल करवाते हैं जिसका हक़ इनकी बहुमुखी प्रतिभा रखती है | सभी प्रमुख समूह महीने में कम से कम 2 इवेंट रखते हैं और उसमें लोगों को फ़ेसबुक और वाट्सप के ज़रिए अपनी रचना प्रस्तुत करने के लिए इन्वाइट करते हैं |

इसके बाद तो इन मीट अप्स  में इन युवाओं की झड़ी सी लग जाती है | सभी इतने जोश ख़रोश के साथ तशरीफ़ लाते हैं की सारा माहौल ही इनकी गुफ्तगू से गूँज उठता है | मैं पिछले 2 सालों से Pach नाम के 1 राइटर्स ग्रुप के मीट अप में बिना किसी रुकावट के लगातार जा रहा हूँ | इस ग्रुप का पूरा नाम Poetry end cheep homour  है | इस ग्रुप की ये ख़ासियत है की आप यहाँ बिना किसी सीमाओं के अपनी भावनाओं को पच कर सकते हैं , ऐसा इस ग्रुप के founder  का कहना है | यहाँ  आपको ऐसा अहसास होगा की आप अपने घर में घर के सदस्यों के बीच Poetry कर रहे हो , इस ग्रुप में आपको इतनी तवज़्ज़ो मिलती है की आप खुद को फूला नहीं समाते हैं |

मज़ाक के माहौल में आप इतना घुलमिल जाते हैं की आप चाहेंगे की ये मीट अप ख़त्म ही ना हो , बस चलती रहे देर तक |

पच ग्रुप के फेसबूक पेज़  पे भी इतनी चहल -पहल होती है की हर युवा अपने साहित्य को लगातार अपने साथियों के साथ साझा करते रहते हैं | अनूप बिश्नोई , सीधांत माग़ो , विवेक कुमार पच को गाइड करते हैं और हरेन्दर शर्मा  उर्फ हैरी , आशीष जांगरा , नरेन्दर कुमार, इशान ड़फूटी, दीपाली शर्मा, मेघा गरचा  पच के रेग्युलर मेंबर हैं जो अपनी कविताओं और कहानियों से पच को गुलज़ार करते हैं | अभी कुछ दिन पहले ही पच ने अपना दूसरा जन्मदिन मनाया है श्री अशोक चक्रधर जी की उपस्थिति में जिन्हें पूरा हिन्दुस्तान 1 हास्य  और व्यंग कवि के रूप में जानता है | उन्होनों पच के जन्मदिवस पर सभी सदस्यों को भावों के बारे में विस्तार से बताया और कविता के कई रूपों का भी ज़िक्र अलग से किया |

तो इस तरहा से हम कह सकते हैं की पच अपने मकसद में कामयाब होता दिखाई दे रहा है | इस ग्रुप में 1  अलग सा उत्साह नज़र आता है | इसके अलावा 1 ग्रुप और है जो सिर्फ़ Poetry  को अपने तरीके से सबके सामने ला रहा है | इस ग्रुप का नाम Poets corner  है और ये इस ग्रुप पे देश भर के Poets  का जमावड़ा है | फेसबूक  पे करीब 22 हज़ार  Poets  की संख्या Poets corner के ग्रुप में है | ये सभी 22 हज़ार मेंबर रोज ग्रुप में अपनी Poem  डालते हैं और 1 दूसरे की Poem भी पसन्द करते हैं | Poets corner हर साल सर्दियों में Delhi Poetry Festival का भी आयोजन करता है | इस पूरे Fest  में देशभर की हस्तियों के साथ Poets corner  के members साहित्य का अलख जलाते हैं |

हमारा Young  साहित्य इन writer groups  की बाबत भी अपने आपको लिखते हुए निखार रहा है या मांज रहा है | किसी ने सही भी कहा है की हर क्रांति में युवाओं की सबसे बड़ी भूमिका होती है और ये जो साहित्य की यानी नये और मौलिक साहित्य की क्रांति है इसमें यूथ ही अपने तरीके से बदलाव ला सकता है और सही मायनों में देखा जाए तो बदलाव आ भी रहा है | आज इस युवा पीढ़ी में इतना साहस आ चुका है की ये अपने का लिखा सबको परोसते हैं और खुद भी सबका लिखा हुआ चखते हैं |


इसीलिए इस Young साहित्य में जो उछाल आ रहा है वो इसी बदलाव और सोच का नतीजा है |

- Ashish Jangra