हर कहानी में किरदार का अपना १ अलग ही महत्व होता है, बिना किरदारों के कहानी कहना या गढना असंभव सी बात है | ये ठीक उस तरह की बात है कि जैसे शादी है पर बगैर दूल्हा दुल्हन के, बहुत से लेखकों का मानना है कि कहानी की शुरुआत ही किरदार से आरंभ होती है | जब कोई किरदार आप आस पास के माहौल में देखते हैं तो आपके दिमाग़ में १ कहानी पनपनी शुरू हो जाती है |
कहानी अपना आकार किरदार के साथ ही ले पाती है, और किरदार भी अपना रंग तब जमा सकता है जब कहानी किरदार की पकड़ में हो. ये भी सच है की किरदार कोई पैदा करने वाला जीव नहीं है, वो पहले से ही हमारे आसपास के जीवन में जीवन यापन कर रहे होते हैं | आप मंटो साहब की कोई भी कहानी पढ़ लीजिए आपको उनकी कहानी के किरदार ऐसे मालूम पड़ेंगे जैसे वे किरदार आपसे मेल खाते हों. और हुआ भी यही था, जब भी उन्होने किसी कहानी का खाका अपने ज़हन में डाला तो उनके किरदार सबसे पहले उनके लिखे हुए पन्नों पर दस्तक देते थे. उसके बाद कहानी अपने चरम पर होते हुए पाठकों के दिमाग़ और दिल पर गहरा प्रभाव छोड़ती थी और आज भी लोग मंटो के प्रभाव से निकल नहीं पाए हैं |
कॉलेज में एक उपन्यास पढ़ा था "जहाज़ का पंछी" इलाचंद्र जोशी जी का लिखा हुआ एक अजीब सी दुनिया में ले जाने वाला उपन्यास, इस उपन्यास का नायक एक घूमकड़ इंसान होता है जो हर बार अपनी यात्रा खुद तय करता है, वो न जाने किस चीज़ की तलाश में भटक रहा होता है, किस मंज़िल को पाने हेतु वो दर दर की ठोकरें ख़ाता है | यह एक आत्मकथा की शैली में लिखा हुआ उपन्यास है | इस किरदार को लेखक ने शायद अपने अंदर जिया है तभी वो इतने अच्छे से संप्रेषण हो पाता है कथा में.
यहाँ मैं एक और उपन्यास का ज़िक्र करना चाहूँगा जिसका शीर्षक "काशी का अस्सी है" इस उपन्यास के लेखक "काशीनाथ" हैं जो काशी यानी बनारस में ही निवास करते हैं | काशी का अस्सी लिखने से पहले काशीनाथ जी ने बनारस को अच्छे से घोट के पिया हुआ था, मेरा यहाँ ये मतलब है कि वे काशी के चप्पे चप्पे से वाकिफ़ हैं |काशीनाथ जी ने इस उपन्यास को वास्तविकता का ऐसा लबादा ओढ़ाया है जो वाकई में बहुत बहुत क़ाबिले तारीफ है!
उन्होने काशी नगरी के अस्सीघाट के उन लोगों का महीन निरीक्षण किया जो मनोरंजक होने के साथ साथ किरदार के प्रारूप में एकदम फिट बैठते थे. काशीनाथ जी इन किरदारों से रोज पप्पू की मशहूर चाय की दुकान में मिलते और उनकी कही बातें उनके गप्पे सब अपने जहन में डाल लेते और घर आकर उन्हें पन्नों पे उतार देते.
तो इसी तरीके को आजमाते हुए काशीनाथ जी ने काशी का अस्सी का निर्माण किया. उन्होने सिर्फ़ किरदारों की खोज़ की और बस फिर बन गया अपने आप में हिन्दी साहित्य का एक कामयाब उपन्यास. विश्व साहित्य की या और दूसरी भाषाओं की कहानियों की बात की जाए तो वहाँ भी यही प्रारूप कामयाब रहा है. लियो तोल्स्तोय से लेकर व्लादिमीर नावकोव तक ने सिर्फ़ मज़बूत और वास्तविक किरदारों का उपयोग करके बेहतरीन रचनाओं का सृजन किया.
कहतें हैं लियो तोल्स्तोय ने जब वार एंड पीस लिखा तो उन्होनें उस समय रूसी राजतंत्र का बहुत ही बारीकी से विश्लेषण किया, इसीलिए वार एंड पीस में इतने सारे किरदार हैं और वे सभी कहानी को उसकी मंज़िल तक ले जाते हैं. चलिए यहाँ तो हमने कुछ लेखकों की कहानियों के बारे में बात की लेकिन अगर हम कहानी और किरदार की असली बात करें तो वो ये है की इन दोनो का एक दूसरे के बिना निर्वाह नहीं हो सकता. अगर कहानी को सृजन की कड़ाही में तलना है तो सबसे पहले हमें किरदारों को मसालों की माफ़िक़ इस्तेमाल करना होगा. हम अगर किरदारों में भी अगर इतना घुस गये की कहानी को ही भूल जाएँ तो वो भी कहानी और किरदारों के लिए अच्छी बात नहीं होगी. इसलिए कहानी और किरदार दोनों को हम किसी कहानी के दो मुख्य और आरम्भिक तत्व मान सकते हैं. तो अबकी बार जब हम कोई कहानी सोचेंगे या लिखेंगे तो हम सबसे पहले किरदार ढूंढ़ेंगे और फिर कहानी की ज़मीन पर क़िस्सों का १ मकान बनाएँगे.
- Ashish Jangra
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